देवास। जिसके हृदय की गति राम चरण को प्राप्त करने की हो जाती हो उसे संसार से विरक्ती हो जाती है। सुकृत का फल सुनिश्चित प्राप्त होता है उसी तरह भरत चरित्र का वर्णन जिसने सुन लिया उसे प्रभु श्रीराम के दर्शन का फल प्राप्त हो जाता है। भरत जीव है तो राम आत्मा है। भरत की भक्ति अनुभव की जाती है, उसे शब्द की सीमा में नहीं बांधा जा सकता है। तुलसीदास जी ने राम चरित मानस में भरत जी के चरित्र का वर्णन जिस प्रकार किया है उसे व्यासपीठ से कहने में भी कई दिन लग सकते हैं। राम चरित मानस एक ऐसा महान ग्रंथ है जिसके होने की अनुभूति ही अध्यात्म की ओर अग्रसर करती है। जिसके घर में राम चरित मानस नहीं है समझो वो हिंदू का घर नहीं है। यह आध्यात्मिक विचार कैलादेवी मंदिर में हो रही श्रीराम कथा के छटे दिवस पर प्रभु राम के वन गमन और भरत राम के मिलन का सुंदर चित्रण करते हुए साध्वी सत्यप्रिया दीदी ने कहे। आपने कहा कि मेघ बरसते हैं किंतु पहाड़ उसके जल को एकत्रित नहीं कर सकते। जल एकत्रित करने के लिए आपको पात्र बनना पड़ेगा, सीधा बनना पड़ेगा। जल एकत्रित करने की क्षमता रखने वाला ही संसार की प्यास बुुझा सकता है। उसी तरह से भक्ति की पात्रता रखने वाला संसार को प्रभु के दर्शन करा सकता है। अधिक ज्ञानी को ज्ञान का अहंकार होता है। इसी कारण वो अध्यात्म को ग्रहण नहीं कर पाता। क्योंकि ज्ञान बाहरी तत्व है और अध्यात्म ईश्वरीय गूढ़ तत्व है। राम के वन गमन का मार्मिक एवं हृदय विदारक वर्णन करते हुए आपने श्रोताओं को भाव विभोर कर दिया। राम का निषाद राज से मिलन, केवट द्वारा गंगा पार कराने वाले वर्णन को कहते हुए आपने कहा कि जब प्रभु राम ने केवट से गंगा पार कराने का कहा तो केवट ने कहा कि प्रभु आप तो बाद में आए हो आपकी महिमा पहले चली आई है। इसलिए मैं बिना चरण पखारे आपको अपनी नाव से गंगा पार नहीं करा सकता। उतराई के लिए प्रभु राम ने भेंट देना चाही तो केवट ने कहा प्रभु मैंने आपको गंगा पार कराई है आप मेरे पित्रों को भव सागर से पार करा दो। वन में भारद्वाज ऋषि से मिलकर प्रभु ने मार्ग पूछा, वाल्मिक जी से कल्याण कैसे किया जाए यह सलाह ली, और अगस्त ऋषि से दुष्टों का नाश करने का उपाय पूछा। आपने कथा प्रसंगों के दौरान बताया कि 14 वर्ष तक अवध वासियों ने तप किया। यही कारण रहा कि 14 वर्ष तक अवध में न किसी ने जन्म लिया न ही किसी की मृत्यु हुई। आपने कहा कि प्रभु राम ने पिता के वचन निभाए, मगर भरत ने पिता की इच्छा को निभाया। प्रभु विमुख होने वाले को त्याग देना चाहिए, चाहे वो सगा ही क्यों न हो। राम चरित मानस के दृष्टांतों के साथ सांसारिक जीवन और घरों में कैसेे संसार के साथ हम इस भौतिकवाद में अध्यात्म को आत्मसाद कर जीवन को संवार सकें। इस विषय पर साध्वी सत्यप्रिया जी ने अनेक सूत्र देकर कहा कि कथा का श्रवण करें और किसी भय के कारण या लोभ को लेकर प्रभु के प्रति आस्था न रखें। प्रभु प्रेम और भाव के भूखे हैं। कथा आरती में संघ के विभाग संचालक अजय गुप्ता, कपिल पंवार, सुरेश जायसवाल, इंदौर से अजय अग्रवाल, ओ.पी. पंाचाल, अस्तित्व सोनी, अमित पांचाल, वृंदावन से सीता दीदी एवं महापौर गीता अग्रवाल, दुर्गेश अग्रवाल, प्राचार्य देवेन्द्र बंसल, हुकमचंद अग्रवाल, ओ.पी. तापडि़या, योगेश बंसल, डॉ. महेन्द्रसिंह चौहान सोनगरा, महेश गर्ग, राजेश पटेल, समाज सेवी चंद्रभान नानवानी, अजबसिंह ठाकुर, अखिलेश दवंडे, दुर्गा वाहिनी की राष्ट्रीय सहसंयोजिका पिंकी पंवार, शशि कला ठाकुर, पार्षद अकीला ठाकुर आदि उपस्थित थे। व्यासपीठ की पूजा दीपक गर्ग, अनामिका गर्ग, प्राची गर्ग, हितेष गर्ग आदि ने की।

