देवास मे पवित्र क्षिप्रा मैया के तट पर भव्य आयोजन मे उगते सूर्य को अर्ध्य से पर्व समापन देवास(शाकिर अली दीप) भारतीय संस्कृति के सभी त्यौहार और पर्व श्रेष्ठ और सुन्दर हैं । यह हमे सुन्दर,सशक्त ,सफल और संयमी बनाने मे सहयोगी हैं । हर त्यौहार और पर्व हमे सफलताओं और आरौग्य का संदेश देकर हमारी मनोकामनाएं पूर्ण करने मे सहयोगी होते हैं । लोकप्रिय मॉडल,समाजसेवी ,सफल बिजनेस वुमेन प्रतिभा प्रसाद ने छठ महापर्व के अवसर पर मैया क्षिप्रा के तट पर आयोजित छठी मैया के चार दिनी आयोजन के अंतिम दिन समापन पर व्यक्त किये । पूर्वोत्तर भारतीय समाज के देवास और इंदौर जिले के समाजजनों ने बड़ी संख्या मे मां शिप्रा नदी के तट पर छठ पूजा के दिन डूबते सूरज को अर्ध दिया तथा सोमवार सुबह उगते सूर्य देव को अर्ध्य देकर खरना प्रसाद लेकर 36 घंटे से चल रहे निर्जला उपवास का समापन किया गया । समाज के जिन लोगों ने निर्जला उपवास किया उन्होंने 36 घंटे के बाद अन्न और पानी का सेवन सुबह-सुबह किया । समाज के लोगों ने बड़ी संख्या में छठ महोत्सव का पूजन अर्चन अंतिम दिन किया ।सभी व्रत धारियों ने विधि विधान से गेहूं को सुखाकर अलग से पिसवा कर उसका ठेकुआ हुआ निर्मित प्रसाद और अन्य फल फूल के साथ पूजन किया । केला नारियल आदि का विधिवत अर्ध्य के समय पूजन भगवान सूर्य देव को करते हुए दूध और जल से अर्ध्य दिया गया ।शिप्रा नदी तट पर दोनों तरफ घाटों पर 5000 से ज्यादा लोगों ने पूजन किया । देवास निवासी मिसेज इंडिया प्रतिभा प्रसाद और परिवार ने बच्चों के साथ पवित्र शिप्रा तट पर पूजा अर्चना किया । इसी तरह मीठा तालाब पर भी काफी संख्या में लोगों ने सूर्य देव को अर्ध्य देकर पर्व का समापन किया । प्रतिभा प्रसाद छठ महापर्व के विषय मे विस्तार से बताती हैं कि पहला दिन: नहाय-खाय
इस दिन व्रतिन (व्रती महिलाएँ) सुबह-सवेरे नहा कर मौसमी सब्ज़ियों, चावल और दाल का भोजन करती हैं। दाल में अमूमन चना सबसे अधिक प्रचलित है, जबकि सब्ज़ियों में लौकी (जिसे ‘कद्दू’ के नाम से जाना जाता है); साथ में चने का साग भी होता है। व्रतिन का बिना नमक का भोजन प्रसाद होता है, जिसे बाद में पूरा परिवार ग्रहण करता है।
इसी दिन (या अगले दिन, सुविधानुसार) व्रतिन अपने घर के अन्य लोगों की मदद से सूर्य देवता को चढ़ाए जाने वाले प्रसाद को बनाने में प्रयुक्त होने वाले गेहूँ को धोकर सूखने के लिए फैला देती हैं। घर के बच्चों की ज़िम्मेदारी होती है ध्यान रखना कि गेहूँ में कोई गंदगी न गिर जाए या चिड़िया जूठा न कर दे या बीट न कर दे।
इस दिन सबसे चर्चित मिठाई ठेकुआ की भी तैयारी जम कर होती है। गेहूँ को या तो घर ही में जाँते में पिसा जाता है या पास की चक्की से पिसवाया जाता है। इसी आटे से मिठाइयाँ, रोटी, पूड़ी आदि बनती हैं।
दूसरा दिन: खरना
व्रतिन का पूरे दिन उपवास होता है- वह भी निर्जला। इसके अलावा उन्हें स्वच्छता, शौच-अशौच के भी कठोर नियमों का पालन करना होता है। शाम को वही घर वालों के लिए भोजन भी बनाती हैं, जिसमें पूड़ी और तस्मई (गुड़ या शक़्कर की खीर) प्रमुख होते हैं। तस्मई में एक बूँद पानी का प्रयोग नहीं होता है और दूध उसी गाय का इस्तेमाल किया जाता है जिसका बछड़ा जीवित रहता है।
शाम को भोजन बनाने से खाली होकर व्रतिन पूजा पर बंद कमरे में बैठती हैं। विभिन्न देवताओं, जिनमें ग्राम और कुल के भी देवी-देवता शामिल होते हैं, को नैवेद्य का भोग लगता है। इस नैवेद्य में रोटी, तस्मई और केला होता है, और यह भोग केले के पत्ते पर ही लगता है।
व्रतिन जब पूजा करतीं हैं तो पूरा घर दम साधे बैठे रहता है ताकि उनका ध्यान भंग न हो जाए। उसके बाद वे प्रसाद ग्रहण कर अपने उपवास का पारण करती हैं। वे अपने थाल में कुछ खाना छोड़ कर उठतीं हैं, जिसे घर के बाकी सदस्य प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। कई बार तो घरों में इस प्रसाद को ग्रहण करने के लिए आपस में होड़ लग जाती है, क्योंकि यह माँ के प्रसादों में सबसे अनुपम माना जाता है। इस नैवेद्य के प्रसाद के बाद पूरा घर तस्मई और पूड़ी ग्रहण करता है।
तीसरा दिन: संध्या अर्घ्य
तीसरे दिन व्रतिन का उपवास फिर शुरू हो जाता है जो लगभग 36 घंटे चलता है। यह भी निर्जला ही होता है। इस दिन परिवार के बच्चे या युवा डलिया और सूप तैयार करते हैं जिनमें ठेकुआ, लडुआ, साँच और घर के पास उगने वाली कोई भी फसल (गन्ना, संतरा, सेब से लेकर मूली, केला, मूँगफली, मकई तक) हो सकते हैं। घर के पुरुष इन डलियों को सिर पर लेकर घर से घाट तक जाते हैं। रास्ते भर में सफाई, पानी के छिड़काव आदि से स्वच्छता और शुचिता बरकरार रखे जाते हैं।
डलिया को घाट पर खोल कर रख दिया जाता है। व्रतिन जल में स्नान कर ढलते सूर्य और प्रत्यूषा की वंदना करती हैं। इसके बाद वे हर डलिया को एक दिए के साथ हाथ में लेतीं हैं और वे और परिवार के अन्य सदस्य डलिया में जल और दूध द्वारा अर्घ्य देते हैं।
इसके बाद व्रतिन फिर एक बार स्नान करतीं हैं और उसके बाद घाट पर पूजा होती है। इसमें आराधना, पुष्पांजलि, धूप चढ़ाना और अगरबत्ती जलाना शामिल होते हैं। डलिया को पुरुष सदस्य वापिस घर ले आते हैं और इसे सहेज कर रात भर के लिए ऐसी जगह स्थापित किया जाता है जहाँ गलती से स्पर्श, पैरों का लगना आदि न हो।
चौथा दिन: ऊषा अर्घ्य
शाम के अर्घ्य की ही प्रक्रिया इसमें दोहराई जाती है। डलिया लेकर घाट पर पहुँचा जाता है, जहाँ व्रतिन पानी में उतर कर सूर्योदय का इंतज़ार करतीं हैं। जैसे सूर्य देव देवी ऊषा के साथ प्रकट होते हैं, युगल को जल और दूध का अर्घ्य शाम की ही भाँति पहली किरण के साथ दिया जाता है।
इसके बाद डलिया को वापिस घर ले जा कर परिवार के लोगों और पड़ोसियों में प्रसाद वितरित होता है। व्रतिन के जलाशय से बाहर आने तक पूरा परिवार भी उनके साथ खाली पेट प्रतीक्षा करता है।
व्रतिन जलाशय से बाहर आकर नए वस्त्र धारण करतीं हैं और घर की अन्य महिलाओं के साथ वापिस घर जातीं हैं। रास्ते में खेतों में वे मृदा (मिट्टी) की भी पूजा करतीं हैं। इसे भूमि की उर्वरा शक्ति के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन माना जाता है।
जब व्रतिन घर पहुँचती हैं तो घर के सभी सदस्य उनके चरण स्पर्श कर उनसे आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। उन क्षणों में जब वे अपनी सभी इन्द्रियों और अंगों के आवेश को स्थिर किए हुए होतीं हैं, तो उनकी वाणी में माता उषा या छठी मईया का निवास माना जाता है।
डलिया के प्रसाद के अलावा इस वक्त का मुख्य भोजन कद्दू (लौकी)-भात होता है।
बिहार में सबसे प्रचलित छठी मईया से मॉं, दादी, नानी हमेशा ही प्रार्थना करती रहती हैं। ऐसी मान्यता है कि माँ उषा अपने बच्चों का सदैव ध्यान रखतीं हैं। यह ‘कष्ट’ माँ उषा की संतान होने के प्रति आभार प्रकट करने का एक ज़रिया है।

