
रतलाम (खुमानसिंह बैस/शाकिर अली दीप) । जेल मे जहां ईमानदारी ,समर्पित और सक्रिय अधिकारी ,कर्मचारी होते हैं वहां का वातावरण सकारात्मक होता है और बंदियों मे सुधार होकर वह राष्ट्र की मुख्य धारा से जुड़कर सभ्य समाज मे शामिल होते हैं और जहां भ्रष्ट अधिकारी होते हैं वहां असामाजिक और खतरनाक अपराधियों को प्रोत्साहित किया जाता है ।
शासन से वेतन और सम्मान पाने वाले जब नियमों के विरुद्ध अपराधियों के संवरक्षक सहयोगी की भूमिका मे नजर आते हैं तब वह हमारे सामने सवाल बन जाते हैं ।
26 जून 2020 को रतलाम जेल से जेल अधीक्षक आर.आर.डांगी, गेट
कीपर प्रहरी मनीष झाला और प्रहरी कालूसिंह डाबर द्वारा अबोध बालिका के
बलात्कारी अपराधी गेंदालाल (जिसे आई.पी.सी. की धारा 376(2) 5 (एल)
6 पास्को एक्ट में 10 वर्ष की कठोर सजा हुई थी ) को इन तीनों ने योजनाबद्ध जेल से भगवा दिया |
अपने इस शर्मनाक अपराध को छिपाने के लिये इन्होने एक और गम्भीर अपराध करके
यह रूपांकित करने की कार्यवाही को अंजाम दिया कि बंदी को जेल से उपचार के लिये
अस्पताल भेजा गया था और बंदी अस्पताल से भाग गया |
उपरोक्त तीनों पदाधिकारियों की आपराधिक साजिश का पर्दाफाश जेल नियम
178 (क) से होता है, जिसमें प्रावधान है कि गम्भीर रूप से बीमार बंदी को अस्पताल भेजने
के लिए यदि पुलिस गार्ड न मिले तो बंदी को दो प्रहरियों के साथ ही अस्पताल भेजा जाना
चाहिये ।
सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए जेल मुख्यालय भोपाल से भी एक परिपत्र क्रमांक
14154/वारन्ट/96/भोपाल दिनांक 4 जुलाई 1996 को निर्देश दिये गए कि बीमार बंदी को दो
प्रहरियों के साथ चिकित्सालय ले जाया जाए ।
एक प्रहरी चिकित्सकों और दवाईयों की
व्यवस्था करेगा और दूसरा प्रहरी अलग से बीमार बंदी की सुरक्षा को सुनिश्चित करेगा ।
परिपत्र में यह निर्देश भी थे कि जेल अधीक्षक अथवा जेलर बंदी विशेष के संदर्भ में सुरक्षा
अथवा अन्य आवश्यकताओं को देखते हुए दो से अधिक प्रहरियों के साथ भेजना आवश्यक
समझें तो भेजे जा सकते हैं |
इस विषय पर म.प्र. शासन जेल विभाग एवं जेल मुख्यालय
भोपाल ने बंदियों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए समय-समय पर परिपत्र जारी
करके प्रदेश के समस्त जेल अधीक्षकों को सचेत किया और यह चेतावनी भी दी गई कि
आदेशों का उल्लंघन करने वालों के विरूद्ध कड़ी से कड़ी कार्यवाही की जाएगी ।
मध्यप्रदेश की जेलों में बढ़ रही फरारी की घटनाओं की रोकथाम के लिये
तत्कालीन मुख्य मंत्री दिग्विजयसिंह ने दिनांक 04.09.2002 को वरिष्ठ अधिकारियों की एक
मीटिंग बुला कर गहरी चिन्ता प्रकट की थी । इस बैठक में यह निर्णय लिया गया कि जेलों
से फरारी के प्रकरणों में लिप्त अधिकारियों एवं कर्मचारियों के विरूद्ध आपराधिक प्रकरण दर्ज
किया जाए और विभागीय जांच में दोषी पाए गए कर्मचारियों को सेवा से बर्खास्त करने का दण्ड दिया जाए ।
इस विषय पर जेल मुख्यालय ने तत्कालीन मुख्य मंत्री का उल्लेख करते हुए
एक सरगर्भित और विस्तृत निर्देश परिपत्र क्रमांक-100/वारन्ट/2002/भोपाल दि. 25.11.2002
जारी किया । इस परिपत्र में जेल मेन्युअल में प्रावधानित नियमों का भी स्पष्ट रूप से उल्लेख
किया गया था ।
इतने स्पष्ट प्रावधानों और निर्देशों को दर किनार करके तीनों पदाधिकारियों ने
घृणित और दुराचारी बंदी को भगवाने का अपराध किया । इतना ही नहीं एक गम्भीर अपराध करके
उस अपराध को छिपाने और फरारी को सामान्य फरारी का स्वरूप देने के लिये पहले
अपराध की तुलना में एक और दूसरा गम्भीर अपराध करने का गम्भीर षडयंत् भी रचा । दूसरा
अपराध कारित करने के लिये तीनों पदाधिकारियों ने भगाए जाने वाले को
गम्भीर बीमारी से ग्रसित बनाया ।
इस कार्य में गेट कीपर ने बीमार बंदी को दो या दो से
अधिक प्रहरियों को न सौंपते हुए नियम विरूद्ध एक प्रहरी को सौंपने की प्रविष्टी जेल गेट रजिस्टर में जेल नियम 225 के अधीन कर दी और प्रहरी कालूसिंह डाबर ने भी दो प्रहरियों
की मांग नहीं करते हुए बंदी को खुद के हस्ते अकेले प्राप्त कर लेने का दिखावा करके बंदी
प्राप्त कर लिया ।
तीनों पदाधिकारियों ने बंदी को तो भगवा ही दिया और उसके अस्पताल से
भाग जाने का नाटक भी किया ।
बंदी के अस्पताल से फरार होने की एफ.
आय.आर. दो बत्ती थाना स्टेशन रोड में करवा दी ।
तीनों पदाधिकारिर्यों ने बंदी को भगवा
कर गंभीर अपराध किया और अपराध को जानबूझकर स्वाभाविक घटना का स्वरूप प्रदान
करने का एक और गंभीर अपराध कर दिया ।
इस प्रकार इन तीनों ने आई.पी.सी. की धारा 192,193,
203, 223, 467, 468 471और 120 (बी) के अधीन गंभीर अपराध किया है ।
जेल मुख्यालय भोपाल ने उनके आदेश क्रमांक 895/पी.ए./ए.डी.जी./2020/भोपाल
दिनांक 03.06.2020 द्वारा जेल अधीक्षक डांगी को निलंबित करके प्रमुख सचिव जेल, निज सहायक डी.जी.जेल, अति. महानिदेशक जेल (पश्चिम/पूर्व) अधीक्षक केन्द्रीय जेल इन्दौर तथा
कलेक्टर जिला रतलाम की ओर सूचनार्थ पृष्ठांकित किया गया है ।
ध्यान देने योग्य बात तो
यह है कि निलम्बन आदेश में यह स्वीकार तो किया गया कि जेल अधीक्षक डांगी ने जेल मुख्यालय को भ्रामक जानकारी भेजी, जेल मेन्युअल 1968 के सुरक्षा से संबंधित नियमों तथा जेल मुख्यालय द्वारा समय- समय पर जारी परिपत्रों में दिए गए प्रावधानों एवं नियमों का पालन नहीं किया और पर्याप्त सुरक्षा अमला होने के उपरांत भी दायित्वों के निर्वहन में गंभीर लापरवाही की गई ।
यह आश्चर्य जनक है कि जेल मुख्यालय को फरारी की
घटना सूचनार्थ भेजी । इसकी एक प्रतिलिपि पुलिस अधीक्षक रतलाम को भी सूचना के साथ
आवश्यक कार्यवाही करने के लिये प्रेषित कर दी जाती तो पुलिस अधीक्षक रतलाम जेल
मेन्युअल क नियम 280 (ए) और (डी) के अधीन पदाधिकारियों के संदिग्ध तथा बंदी को फरार
करवाने के अपराध में अनुसंधान करके नियमानुसार कार्यवाही करते ।
आर.आर. डांगी के विषय में जानकारी प्राप्त हुई है कि ये अगस्त 2003 से
जुलाई 2005 तक उप जेल नीमच में प्रभारी जेलर के रूप में पदस्थ थे ।
इस अवधि में इन्होनें
एन.डी.पी.एस. के तीन बंदियों को जेल से भगवा दिया था, जिनका विवरण निम्नानुसार है
01. बलवन्तसिंह पिता मानसिंह 01.01.2002 धारा एनडीपीएस,
02. मदनलाल पाटीदार पित बंशीलाल 28.06.2003 धारा एनडीपीएस,
03. रमेश पिता हजारी 26.04 .2004 धारा एनडीपीएस तीनो दस-दस वर्ष के कठोर कारावास के अपराधी होकर तीनो बंदियों को नीमच जेल से दिनांक 21.06.2004 का भगाए व को भगाए गये ।
प्राप्त जानकारी के अनुसार ये तीनों बंदी जेल मेन्युअल के नियम 654 (1) (बी)
और (सी) के प्रावधानों के अधीन जेल के बाहर (दीवारों के बाहर) किसी भी श्रम के लिये
नियोजित नहीं किये जा सकते ।
वैसे भी एनडीपीएस के बंदियो को अन्य बंदियों के समान
जेल मेन्युअल के चेप्टर पार्ट- 11 रेमीशन एण्ड रिडक्शन ऑफ सेन्टेनसेस में वर्णित नियमों के
अधीन माफी देने का प्रावधान नहीं है लेकिन डांगी ने तीनों बंदियों को फरार करवा कर एक
फर्जी कहानी तैयार कर के यह कहा कि जेल की गौशाला में बंदियों की आवश्यकता थी
इसलिये उन्हें बाहर कमान अर्थात (आऊट गैंग) में काम करने को लिया ।
नशा बेचकर
नशा करने वालों को जिन्दा लाश बनाने तथा उनके माता-पिता और परिवार को तिल-तिल
कर मारने वाले अपराधियों को भगवाने के लिये डांगी को चेतावनी तक नहीं दी गई ।
और इससे अधिक नियमों का दुरुपयोग क्या होगा कि ऐसे अधिकारी को दण्ड न दिया जाकर उसे भविष्य में कैदी भगवाने के लिये प्रोत्साहित किया गया जिसका प्रमाण रतलाम मे मिल भी गया ।
डांगी किन कारणों से और किसके संवरक्षण मे(गंभीर अपराध करने के बाद भी दण्ड पाने से बचा लिये गये ) को समझने के लिये
“इन बिटविन द लाइन्स ” समझना होगा ।
रतलाम जेल से बंदी की फरारी की प्राथमिक जांच करने के लिये जेल मुख्यालय से
अखिलेश तोमर को भेजा गया था । श्री तोमर वो ही अधिकारी हैं जो केन्द्रीय जेल भोपाल
में पदस्थ थे और इन्हीं के कार्यकाल में जेल से सिमी संगठन के 8 दुर्दान्त आरोपी एक प्रहरी
की गर्दन रेतकर (काटकर) फरार हुए थे । सर्वाधिक आश्चर्य की बात तो यह है कि श्री तोमर
ने अधीक्षक केन्द्रीय जेल के पद पर पदस्थ रहने के दौरान लगभग एक वर्ष तक जेल का नाईट
राऊण्ड ही नहीं किया जिसके कारण जेल का पूरा सुरक्षा अमला भी लापरवाही से ग्रसित
हो गया था ।
श्री तोमर ने जेल नियम 93 की घोर अवहेलना की और साथ हीं साथ जेल मुख्यालय
द्वारा जारी परिपत्र क्रमांक 37/वारन्ट-2/2010/भोपाल दिनांक 03.11.2010 की धज्जियां
उड़ाकर उसे कूड़ेदान में डाल दिया, जिसमें साफ-साफ निर्देश थे कि जेल अधीक्षक रात्री में 12.30
बजे से 4.30 बजे के मध्य कम से कम आघा घंटा नाईट राऊण्ड करेंगें ।
राऊण्ड लेने के बाद
उसका परिणाम अपनी “आर्डर बुक” में लिखेंगें और समस्त महत्वपूर्ण स्थानों का राऊण्ड लेंगें
और चेक करेंगें ।
पता चला कि उन्हें लगभग 18 माह तक सस्पेन्ड रखा गया ।
अब एक ऐसे
अधिकारी को जो भोपाल जैसी संवेदनशील जेल में लापरवाही की समस्त सीमाएं तोड़ चुके
हों, क्या उन्होंनें जेल मेन्युअल के नियम, शासन तथा जेल मुख्यालय से समय-समय पर जारी
परिपत्र तथा भारतीय दण्ड विधान विभिन्न आपराधिक धाराओं को विचार क्षेत्र में रखते हुए
जांच की होगी ? ।
पुलिस अनेकों कठिनाइयों , साहस, वर्तमान राजनैतिक परिपेक्ष्य में दबाव
के चलते अपनी जान की बाजी लगाकर दुर्दान्त से दुर्दान्त और घृणित अपराधों में लिप्त
अपराधियों को पकड़ती है, उनके विरूद्ध साक्ष्य एकत्रित करती है और न्यायालय से दण्डित
करवाने में सक्रिय रहती है वहीं कुछ जेल अधिकारी स्वयं को सर्व शक्तिमान समझते हुए
उन्हें भगवा देने का दुस्साहस करते हैं और वह भी बेखौफ होकर ।
जनता अपेक्षा करती है कि बलात्कारी कैदी को भगाने के षडयंत्र में सम्मिलित
जेल अधिकारी एवं कर्मचारियों के विरूद्ध जेल नियमों के तहत तथा म.प्र. शासन जेल विभाग
द्वारा समय-समय पर जारी परिपत्रों के अनुसार कठोर कार्यवाही की जाये ताकि भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं पर अंकुश लग सके ।
अगर दोषियों को दण्ड के स्थान पर प्रोत्साहन दिया जाएगा ,जांच मे सहयोग किया जाएगा तब नियम और कानून का क्या मतलब रह जाएगा ?

